Border 2 Review : एक सीन…और पूरा थिएटर खामोश हो गया!

Border 2 Review In Hindi

जब भी भारतीय सिनेमा में वॉर फ़िल्मों की बात होती है, तो कई यादगार फ़िल्मों के नाम सामने आते हैं। लेकिन जिस फ़िल्म ने यह साबित किया कि युद्ध पर बनी फ़िल्म सिर्फ़ एक्शन नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ा भावनात्मक अनुभव भी हो सकती है—वह थी Border
“संदेसे आते हैं” की कसक, सनी देओल की दहाड़ और सैनिकों की कुर्बानी… यह सब केवल सिनेमा नहीं था, बल्कि एक एहसास था, जो आज भी दिलों में ज़िंदा है।

ऐसी ऐतिहासिक और भावनात्मक फ़िल्म का सीक्वल बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं। लेकिन Border 2 इस चुनौती को पूरे सम्मान, गंभीरता और आत्मविश्वास के साथ स्वीकार करती है।

Border 2

फ़िल्म का पहला सीन आते ही यह साफ़ हो जाता है कि मेकर्स ने इस प्रोजेक्ट को हल्के में नहीं लिया। कैमरा, बैकग्राउंड स्कोर और माहौल—सब कुछ दर्शक को तुरंत उस दुनिया में खींच लेता है, जहाँ देश पहले आता है और व्यक्ति बाद में।

फ़र्स्ट हाफ़ में सनी देओल की एंट्री वही पुराना भरोसा जगाती है—
भारी आवाज़, मज़बूत मौजूदगी और स्क्रीन पर पूरा कंट्रोल।
अकादमी के दृश्य, जहाँ नए और पुराने किरदार साथ आते हैं, सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करते बल्कि कहानी को उद्देश्य भी देते हैं। भाईचारे और फर्ज़ पर दिया गया भाषण सीधे दिल में उतरता है।

घर-परिवार से विदा लेते सैनिकों के दृश्य बेहद भावुक कर देते हैं। माँ की आँखों में डर, पत्नी की चुप्पी और बच्चों की मासूम उम्मीद—ये सब मिलकर दर्शक को कहानी से गहराई से जोड़ देते हैं।

इसके बाद आता है सनी देओल का वही जाना-पहचाना रौद्र रूप—
दमदार डायलॉग्स, आक्रामक एक्शन और एक ऐसा इंटरवल ब्लॉक जो थिएटर में तालियाँ और सीटियाँ दोनों निकलवाता है।

हाँ, कुछ रोमांटिक ट्रैक्स और कैरेक्टर-बिल्डअप सीन थोड़े लंबे लगते हैं, जिन्हें और कसा जा सकता था।

Border 2 की असली जान

फ़िल्म का सेकंड हाफ़ इसकी असली ताक़त है। यहाँ भावनाएँ और एक्शन सही अनुपात में मिलते हैं। माँ-बेटे का ट्रैक और ख़त पढ़ने वाला सीन आँखें नम कर देता है। युद्ध के मैदान में हर किरदार को चमकने का मौका मिलता है—चाहे वह मोटिवेशनल स्पीच हो या दुश्मन से सीधा सामना।

सनी देओल का “जुर्रत” वाला पल पूरी फ़िल्म को अपने कंधों पर उठा लेता है। क्लाइमैक्स और एंड-क्रेडिट्स दिल को भारी कर देते हैं और ओरिजिनल Border को बेहद सलीके से सलाम करते हैं।

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर

संगीत फ़िल्म की आत्मा है।
पुराने गीतों की भावनात्मक ताक़त और नए गानों की मिट्टी की खुशबू मिलकर माहौल बना देती है।
हाँ, “संदेसे आते हैं” का प्लेसमेंट थोड़ा बेहतर हो सकता था, और कुछ युद्ध दृश्य थोड़े जल्दी समेटे गए लगते हैं, लेकिन ये कमियाँ फ़िल्म के असर को कम नहीं करतीं।

अभिनय

फ़िल्म की असली रीढ़ हैं सनी देओल
वह यहाँ सिर्फ़ एक किरदार नहीं, बल्कि एक प्रतीक हैं—
हिम्मत, ग़ुस्सा और देशभक्ति का।

वरुण धवन आत्मविश्वास के साथ सरप्राइज़ करते हैं और अपने हिस्से में पूरी ईमानदारी दिखाते हैं।

दिलजीत दोसांझ ऊर्जा और स्वैग लेकर आते हैं।

आहान शेट्टी का अंतिम क्षण भावुक है और अतीत से एक सुंदर कनेक्शन बनाता है।

सपोर्टिंग कास्ट भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है।

Border 2 फिल्म का भावुक पल वाला सीन

जब एंड क्रेडिट्स में “सनी देओल – धर्मेंद्र के बेटे” लिखा आता है, तो मन अपने आप भावुक हो जाता है।
यह सिर्फ़ एक लाइन नहीं, बल्कि सिनेमा की पीढ़ियों को जोड़ने वाला एहसास है।

क्या Border 2 देखने लायक है?

Border 2 कोई एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म नहीं है और शायद बनना भी नहीं चाहती।
यह एक सीधी, भावनात्मक और गर्व से भरी वॉर फ़िल्म है।

यह Border की विरासत को सहेजती है, उसे आगे बढ़ाती है और दर्शकों को वही देती है जिसकी उन्हें उम्मीद होती है—
देशभक्ति, आँसू और थिएटर से निकलते वक्त सीना चौड़ा होने वाला एहसास।अगर आपको वॉर फ़िल्में, देशभक्ति और सनी देओल की दहाड़ पसंद है, तो Border 2 आपके लिए है।

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